अग्याल एक संस्था या कुछ लोगों का समूह नहीं है अपितु एक आग्रह है एक शुरुआत है | कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर जो शायद हामरे मन में तो है पर वो मुद्दे या तो सिर्फ गीतों में है या बंद कमरों में कुछ बुद्धिजीवी लोगो के ही काम आ रहे है| हमारी भाषाएँ ,गढ़वाली एवं कुमॉवनी अब शायद विलुप्त होने की कगार में है | UNESCO ने भी गढ़वाली को उन संसार की विलुप्त होत भाषाओँ की श्रेणी में डाल दिया है और भाषा ही नहीं बल्कि हमारे प्रदेश की संस्कृति ,हमारा पहनावा, हमारे रीती रिवाज ,परंपरा ,हमारा खानपान एवं और भी बहुत कुछ. उत्तरप्रदेश से उत्तरांचल फिर उत्तराखंड की दौड़ में नाम और राज्य तो बदल गए परन्तु क्या पहाड़ के वासियों का विकास हो पाया? गाँव के गाँव खाली हो गए नौकरी,शिक्षा और स्वस्थ्य की खोज में कितने ही परिवार है जो कोई भी गढ़वाली या कुमॉवनी भाषा का इस्तेमाल नहीं करते और न ही बच्चो को सिखाते है | हमारे पारंपरिक नृत्य ,चौंफल ,थडिया.लोकगीत ,ढोल की चौरंस ,इष्ट की भभूति ,गाँव की नदिया,पंदेरा और खेती बाड़ी इतेयादी सब विलुप्त सा हो गया है |अग्याल एक कोशिश है की आज की पीडी उठे ,आगे आये और इन विलुप्त होती परम्पराओं का संरक्षण करे | अगर हम सब मिल कर थोडा थोडा भी कर पाए तो हम अपने अस्तित्व को बचा पाए . अग्याल किसी दुसरे को उठाने का प्रयत्न नहीं नहीं है अपितु आत्ममंथन के लिए है| अग्याल आपका और आपके सुझावों के लिए तत्पर है |

                                                              bsp;  

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